सीरिया में जारी गृहयुद्ध को पिछले महीने छह साल पूरे हो गए. यह युद्ध काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा है. शुरुआती चार सालों तक इसमें विपक्षी यानी विद्रोही हावी रहे और इस दौरान उन्होंने आधे से ज्यादा सीरिया पर अपना कब्जा जमा लिया. माना जाने लगा था कि जल्द ही सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद को विद्रोहियों के दबाव में अपना पद छोड़ना पड़ेगा.

लेकिन, सितम्बर 2015 से इस गृहयुद्ध की तब दिशा बदल गई जब रूस ने इस लडाई में असद को समर्थन देने का ऐलान कर दिया. रूस के दखल के बाद बीते 18 महीनों में असद सरकार ने एक के बाद एक होम्स, हामा, दमास्कस, लताकिया और फिर पूर्वी अलेप्पो जैसे बड़े इलाकों पर अपना कब्जा वापस ले लिया. गृहयुद्ध में रूस के दखल और असद की जीत ने परदे के पीछे से विपक्षियों की मदद कर रहे अमेरिका, इजरायल, तुर्की और सऊदी अरब के हौसले भी पस्त कर दिए. और इन सभी ने विद्रोहियों को मदद देना बंद कर दिया. तुर्की जिसे विद्रोहियों का सबसे बड़ा मददगार माना जा रहा था उसने भी इस गृहयुद्ध में अपना मकसद बदल दिया है. रूस से बातचीत के बाद अब वह केवल उन्हीं विद्रोहियों की मदद कर रहा है जो उसके कट्टरदुश्मन माने जाने वाले सीरियाई कुर्दों और आईएस के खिलाफ लड़ रहे हैं.

पूरे माहौल को देखें तो इसमें कोई शक नहीं कि अब इस युद्ध में विद्रोहियों की पकड़ ढीली पड़ गई है और असद सरकार अब उन पर काफी ज्यादा भारी नजर आ रही है. लेकिन, सरकार की जीत और विद्रोहियों की हार के बाद भी ऐसी कई चीजें हैं जिनसे सीरिया में शांति स्थापित होना पहले से ज्यादा मुश्किल नजर आ रहा है.

इस सिलसिले में सबसे नई कड़ी तो अमेरिका के रुख में अचानक आया बदलाव ही है. सीरियाई गृहयुद्ध में पहली बार सीधा दखल देते हुए उसने वहां सरकार के एक प्रमुख एयरबेस पर मिसाइलों की बौछार की है. अमेरिका ने यह नाटकीय कदम सीरियाई सरकार द्वारा किए गए उस रासायनिक हमले के बाद उठाया जिसमें कई बच्चों सहित 70 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि सीरियाई सरकार ने मानवता को तार-तार करते हुए सारी हदें पार कर दी हैं.

विद्रोहियों के हौसले पस्त न होना

इससे पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र संघ के नेतृत्व में हुई चौथी शांति वार्ता में जो हुआ उससे भी इस बात की तस्दीक होती है कि सीरिया में शांति स्थापित होना पहले से ज्यादा मुश्किल हो गया है. पहले माना जा रहा था कि लगातार हार के बाद इस चौथी शांति वार्ता में विद्रोहियों के रुख में कुछ नरमी आएगी. लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं हुआ. इस वार्ता में विद्रोहियों ने बैठने की व्यवस्था को गलत बताते हुए इसके बहिष्कार की धमकी दे दी. हालांकि, इसके आयोजकों द्वारा काफी मानने के बाद वे इसमें शामिल हुए. लेकिन, बताया जाता है कि इसके बाद भी वार्ता के दौरान दोनों पक्ष केवल एक दूसरे पर हावी होने की ही कोशिश करते रहे और अंत में यह वार्ता पिछली वार्ताओं की तरह ही विफल रही.

हालांकि, गृहयुद्ध में लगातार जीत की वजह से असद सरकार को वार्ता में थोड़ा फायदा मिलता दिखा और वह आतंकवाद को वार्ता के प्रमुख एजेंडों में शामिल करवाने में कामयाब रही. दरअसल, अभी तक वार्ता के प्रमुख मुद्दों में जिम्मेदार सरकार, नए संविधान का मसौदा तैयार करना, और यूएन की निगरानी में चुनाव करवाया जाना ही प्रमुख थे. असद सरकार हमेशा से विपक्षियों पर आतंकवाद को बढावा देने का आरोप लगाती रही है जबकि विपक्षी अपनी कोशिशों को शासन की गलत नीतियों के खिलाफ विद्रोह बताते आ रहे हैं. इस वार्ता में भी वे यह मानने को तैयार नहीं थे कि वे किसी तरह के आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं.

ताकतवर विद्रोहियों का वार्ता में शामिल न होना

सीरिया के पूरे घटनाक्रम पर नजर रखने वाली ऑस्ट्रेलियाई विश्लेषक डारा कॉन्डुएट कहती हैं कि यूएन की मध्यस्थता में करायी जा रही शांति वार्ता से सीरिया में शांति आने की कोई संभावना नहीं दिखती. उनके अनुसार उन्हें इस वार्ता का कोई मतलब ही नहीं समझ आ रहा क्योंकि इसमें वे विद्रोही संगठन तो शामिल ही नहीं हैं जो सीरिया में प्रमुख विद्रोही माने जाते हैं और जिनका अभी भी कई प्रमुख क्षेत्रों पर कब्जा बरकरार है.

डारा कहती हैं कि इस समय सीरिया शांति वार्ता में सीरियाई विपक्षियों का प्रतिनिधित्व उच्च वार्ता समिति (एचएनसी) कर रही है जिसका गठन साल 2015 में किया गया था. लेकिन, इस समिति में कुर्दिश डेमोक्रेटिक पार्टी और अहरार अल-शाम शामिल ही नहीं हैं जो सीरिया में सत्ता परिवर्तन के लिए लंबी लडाई लड़ते आ रहे हैं. इसके अलावा इसमें अल-कायदा के पूर्व सहयोगी संगठन हयात ताहिर अल-शाम यानी अल-नुसरा फ्रंट को भी नहीं शामिल किया गया है. डारा के मुताबिक यह साफ़ है कि इन प्रमुख विद्रोही संगठनों के वार्ता में शामिल न होने से अगर शांति वार्ता किसी समझौते पर भी पहुंच जाती है तो उसे लागू करना नामुमकिन होगा.

हार के बाद भी विद्रोहियों के हौसले पस्त न होने का कारण

सीरियाई गृहयुद्ध को करीब से देखने वाले कुछ पत्रकार कहते हैं कि विद्रोहियों के हौसले पस्त न होने का सबसे बड़ा कारण सीरिया की जनता है जो अभी भी असद सरकार को सत्ता से हटाने और विद्रोहियों के प्रयासों का समर्थन कर रही है. पिछले साल जर्मनी में सीरियाई शरणार्थियों के बीच किये गए एक सर्वेक्षण के नतीजों से भी इसका संकेत मिलता है. इसमें करीब 70 फीसदी ने गृहयुद्ध के लिए सीधे तौर पर असद सरकार को जिम्मेदार ठहराया. इस सर्वेक्षण में 77 फीसदी लोगों का कहना था कि वे असद सरकार और उसके सहयोगियों की बर्बरता, अत्याचारों और रासायनिक हमलों से सहमे हुए हैं और सीरिया में उन्हें हर समय सेना द्वारा हत्या और अपहरण का डर सताता रहता था. इस सर्वेक्षण में 51 फीसदी लोगों का यह भी कहना था कि वे तब ही सीरिया वापस जायेंगे जब राष्ट्रपति असद को सत्ता से हटाया जाए. 41 फीसदी लोग लोकतांत्रिक तरीके से देश में चुनाव करवाये जाने की शर्त पर ही सीरिया वापस जाने को तैयार दिखे. जानकार कहते हैं कि लगातार हार के बाद भी विद्रोहियों के हौसले पस्त न होने का प्रमुख कारण जनता में उनके लिए समर्थन और असद सरकार खिलाफ नाराजगी का होना है.

विद्रोहियों की नई तैयारी

सीरिया में काम कर रहे पत्रकारों की मानें तो सीरिया में जारी गृहयुद्ध आगे भी लंबे समय तक जारी रहने वाला क्योंकि लगातार कमजोर हो रहे विद्रोही किसी भी हालत में हथियार डालने को तैयार नहीं है. अलेप्पो सहित कई क्षेत्रों में जंग हारने के बाद अब विद्रोही इदलिब, हामा, दर्रा प्रांत और पूर्वी दमिश्क में इक्कठा हुए हैं. एक लाख से ज्यादा की संख्या में जमा हुए इन लोगों के पास बड़ी मात्रा में हथियार भी हैं. लेकिन, गृहयुद्ध में अपनी ढ़ीली होती पकड और बाहरी ताकतों से मिलने वाली मदद के कम होने की वजह से इन्होने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है.

कई विद्रोही नेताओं का साक्षात्कार ले चुके अमेरिकी पत्रकार चार्ल्स लिस्टर के मुताबिक विपक्षी समूह अब अपनी रणनीति बदलते हुए बचाव की मुद्रा में आ गए हैं. उन्होंने बड़े स्तर पर जंग न लड़कर छोटे-छोटे गुरिल्ला अटैक यानी छापामार हमले करने की रणनीति बनाई है और इसका प्रशिक्षण भी शुरू कर दिया है. चार्ल्स कहते हैं कि यह तरीका गृहयुद्ध की शुरुआत में कई विद्रोही संगठनों ने अपनाया था.

डोनाल्ड ट्रंप अचानक उम्मीद बने

अमेरिका में सत्ता परिवर्तन होने के बाद से विद्रोहियों को पर्दे के पीछे से अमेरिका से मिल रही मदद पूरी तरह बंद हो गई थी. शुरू से ही सीरियाई विद्रोहियों की मदद के खिलाफ रहे डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद साफ़ कर दिया था कि अब अमेरिका विद्रोहियों की कोई मदद नहीं करेगा और असद को सत्ता से हटाने के उसके प्रयास अब से बंद कर दिए जायेंगे.

लेकिन, मंगलवार को असद की सेना द्वारा इद्लिब में आम लोगों पर किए गए रासायनिक हमले के बाद डोनाल्ड ट्रंप का हृदय परिवर्तन हो गया. उन्होंने गुरूवार रात को अचानक सीरिया पर सीधे हमले का आदेश दे दिया. इसके बाद अमेरिका की करीब 60 क्रूज मिसाइलों ने मध्य सीरिया में स्थित शयरत एयर बेस को निशाना बनाया और यहां हवाई पट्टी, विमानों, कंट्रोल टॉवर और गोला-बारूद वाले इलाके को पूरी तरह बरबाद कर दिया. हमले का आदेश देते हुए ट्रंप ने कहा, ‘इद्लिब मे मासूम बच्चों पर किए गए हमले ने मुझ पर बड़ा, बहुत बड़ा असर डाला मैं पूरी दनिया से साथ आकर ऐसे लोगों को सबक सिखाने की अपील करता हूं.’

जानकार कहते हैं कि सीरिया मामले को लेकर ट्रंप के रुख में अचानक आया यह बड़ा बदलाव विद्रोहियों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है. यह विद्रोहियों में नई उम्मीद और उत्साह का संचार करेगा. साथ ही अमेरिकी हमलों से असद की सेना भी कमजोर होगी. कुछ लोग यह भी कहते हैं कि अभी भले ही असद सरकार विद्रोहियों पर भारी पद रही हो, लेकिन, अगर अमेरिका आगे भी ऐसे हमले जारी रखता है तो एक बार फिर असद की सेना और विद्रोहियों के बीच बराबरी की जंग देखने को मिलेगी. हालांकि, इसमें रूस के रुख पर भी काफी कुछ निर्भर करेगा. लेकिन, यह साफ है कि लडाई अभी और लंबी खिंचने वाली है.

जेनेवा शांति वार्ता के बाद सीरिया में यूएन के राजदूत स्टीफन डी मस्तूरा ने कहा था, ‘शांति की ट्रेन तैयार है, यह स्टेशन पर खड़ी है, अपने इंजन को गर्म कर रही है. सब कुछ तैयार है, बस केवल इसे एक एक्सीलेटर यानी रेस देने की जरूरत है और यह उन लोगों के हाथों में है जो इस वार्ता में भाग ले रहे है.’ लेकिन, मस्तूरा के इस बयान से अलग जो लोग सीरिया के हालात अच्छे से समझते हैं, उन्हें पता है कि सीरिया का भविष्य पिछले छह साल से अलग नहीं होने जा रहा. उनके मुताबिक स्टीफन डी मस्तूरा जिस शांति की ट्रेन को रेस देने की बात कर रहे हैं उसे तो अभी पटरी पर पहुंचने में ही वर्षों लगने वाले हैं.