विचार-मंच

मोदी और गुजराती माडल

हमारे विचार, देखी गयी [ 825 ] , रेटिंग :
Saima, Star Live 24
Friday, April 11, 2014
पर प्रकाशित: 15:33:47 PM
टिप्पणी
मोदी और गुजराती माडल

डा. मधुसूदन मिश्र,  'पं ज्योतिर्माली'

2014 का चुनावी माहौल सचमुच अचरज और दिलचस्प भरा होता जा रहा है। भारत में पूंजीवाद की जड़ मजबूत होती जा रही है। यह देश के हित के लिए अच्छी खबर हो सकती है। पर हर हर मोदी ,घरघर मोदी का नारा और नमोनमो का नारा का रुख क्या पूंजीवाद की तरफ ईशारा कर रहा हैवाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में विश्व के महान पूंजीपति ने नरेन्द्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री के रुप में समर्थन किया था। एक थे अनिल अंबानी और दूसरे सुनील मित्तल थे- कहा था कि नरेन्द्र मोदी ने गुजरात का भला किया है इसलिए भारत में उनको प्रधानमंत्री बनना चाहिए। एक पूंजीवादी वर्ग ने नमो का समर्थन तब किया जब भाजपा ने यह निर्णय नहीं लिया था कि 2014 में पी एम कौन बनेगा। जमीनी स्तर से उठने वाले देश में ऐसे कितने सी एम या नेता मिलेंगें। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ऐसे नेता है जो भाजपा के सशक्त नेता हैं। सवाल उठता है यदि मोदी गुजराती पूंजीपतियों की तरफ से प्रधानमंत्री पेश हुए हैं तो वे 2014 में प्रधानमंत्री बनेंगें तो भारत का विकास किस स्तर से करेंगेंयह एक अहम सवाल है। भाजपा की गूंज कम है मोदी-नमो-नमो की गूंज अधिक है।  अब एक सवाल यह भी है कि गुजरात में 3 प्रतिशत ब्राह्मणों के क्षेत्र में परेश रावल अकेले भाजपा प्रत्याशी हैं। पिछली बार वडोदरा से बालकृष्ण शुक्ल भाजपा से जीते थे जो आडवाणी के खासमखास थे। मोदी अब इन्हें हटाकर खुद चुनाव लड़ रहे हैं। अडवाणी के नजदीकीखास लोगों को ठिकाने लगाने में मोदी की भूमिका 2014 के चुनाव में झलक रही है। परेश रावल परदेशिया बाबू मुम्बई में जन्मे गुजराती जरुर हैं पर सबको यही डर है कि परेश रावल जीते भी तो मुम्बई या फिल्मों में ही नजर आयेंगें परेश रावल की तरह मोदी जी भी बनारस में प्रवासी यानी बाहरी हैं। आज जनता अपने क्षेत्र के उम्मीदवार को संसद में भेजना पसंद करने लगी है। ऐसे में उत्तर प्रदेश में गुजरात की तरह राजनैतिक धुंआ उठ रहा है। मोदी का प्रचार प्रसार उसी तरह किया जा रहा है जैसे 1995 में कांग्रेसी प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हाराव को दुबारा प्रधानमंत्री के रुप में मीडिया ऐजेंसी देख रही थी। उन दिनों भी पं. बंगाल के ज्योति बसु का नाम उछाला गया था। तब क्या हुआ कांग्रेस हारी भाजपा की जीत हुई। 2013 में वाइबेंट गुजरात सम्मेलन में आनन्द महिन्द्रा ने भी कहा था गुजरात माडल की चर्चा चीन भी करेगा। इससे तो साफ हो जाता है कि पूंजीपतियों की मिलीभगत से भारत सरकार चली है और आगे भी चलती रहेगी। यहां सबकुछ बिकाउ है नेता मिडिया। असल में देखा जाय तो अब पार्टियां जनता की भलाई के लिए नहीं पूंजीपतियों की भलाई के लिए भामाशाह की तरह अपनी तिजोरी खोल देते हैं और 5 वर्षों में मनमानी ढंग से सरकार से काम कराते हैं और अपना धन हजार गुना बढा लेते हैं। 

मोदी के आगमन से भारत का भला होगा तो कैसे ? देश में अमीर गरीब मध्यम वर्ग के लोगों का प्रजातंत्र राज्य है।  यह सभी बुद्धिजीवी मानते हैं कि भारत का शासन अमीर लोगों के हाथ आजादी मिलने के बाद से आज तक चल रहा है। जवाहरलाल से लेकर आज तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं उनमें गांधी परिवार आजतक दुनिया में सशक्त धनी मानी जाना जाता है। बीच में जितने भी प्रधानमंत्री बने उनमें से अधिकांश जमीन से जुड़े रहे। कांग्रेस धनी पार्टी शुरु से रही है। अब केवल कांग्रेस ही नहीं जाने छोटी मोटी झोला छाप पार्टियां भी हेलीकाप्टर से चलने लगी है। मेरा सवाल पाठकों से यही है कि क्या मोदी से देश का सचमुच भला होने वाला है? अच्छी बात है मोदीजी, राजनाथ या अरुण जेटली जो भी भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री बने जिससे भारत के हर तबके के लोगों को लाभ पहुंचे। परन्तु बनारस से चुनाव लड़ने वाला कानपुर से लड़े, गाजियाबाद से चुनाव लड़ने वाला लखनऊ से लड़े, गुजरात अपना प्रदेश छोड़कर उत्तर प्रदेश के वाराणसी से चुनाव लड़े.यह आजके जनमानस को रास नहीं रहा है। जो घर का मुखिया होता है वह अपने घर की माली हालत को खूब समझता है उसी ढंग से घर का संचालन करता है परन्तु, एक गुजराती चाय बेचने वाले के नाम पर जनता से वोट चाहने वाला देश को जोड़ रहा है या जाति-धर्म प्रदेश में फूट की नींव डाल रहा है। देश में कहीं भी कोई नेता जन्म ले, कार्यक्षेत्र बनावे, जनता के सुख दुख में भागीदार बने, देश के सुधार की विचारधारा रखे यह तो ठीक है। बंगाल में गुजराती माडल, बिहार में गुजराती माडल, राजस्थान में गुजराती माडल, अरुणांचल में गुजराती माडल और उत्तर प्रदेश में गुजराती माडल का सपना दिखाने का मकसद मोदी जी का घूम घूम कर कहना कुछ ओछापन नहीं लगता है ? देश एक आदमी की जागीर नहीं हो सकती। कांग्रेस पार्टी इंदिरा गांधी, राजीव गांधी  के बाद से इसलिए परास्त होती जा रही है क्योंकि भारत नेहरु वंश की पुस्तैनी सियासत मान ली गयी है।  रुस की क्या गति हुई? पं.बंगाल में 34 वर्षों की सियासत का अंत क्यों हुआ? क्योंकि वाम दल में अहंकार बढ गया था। मोदी को पूंजीपतियों का धन नजर रहा है जिससे वे गुजरात का ही भला सोचने वाले हैं। टाटा-बिरला जैसे दूसरे क्षेत्र के पूंजीपतियों ने मोदी का नाम क्यों नहीं लिया


अन्य वीडियो






 टिप्पणी Note: By posting your comments in our website means you agree to the terms and conditions of www.StarLive24.tv