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नई सरकार, चुनौती अपार

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Saima, Star Live 24
Saturday, April 26, 2014
पर प्रकाशित: 15:52:04 PM
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नई सरकार, चुनौती अपार

...विजय कुमार राय

भारत की अर्थव्यवस्था हिचकोले खा रही है, रुपया डगमगा रहा है आधारभूत ढांचे का विकास भी ठहर गया है सांप्रदायिक हिंसा बड़ा मुद्दा है, कुुल मिला कर अगली सरकार के सामने चुनौतियों का पहाड़ है नई सरकार बनाने वाले गठबंधन को जुलाई तक बजट पेश करना होगा, बजट के जरिए नई सरकार को ये भी बताना होगा कि वो पिछली सरकार से कैसे अलग है।

आगामी सरकार ऐसे वक्त में सत्ता संभालेगी, जब अर्थव्यवस्था बेहद खराब स्थिति में है महंगाई हावी है, रुपये को बार-बार डॉलर से लड़ना पड़ता है. नई नौकरियां पैदा नहीं हो रही हैं, विदेशी निवेशक निवेश करने से घबराने लगे हैं कारोबार जगत में निराशा का भाव है युवा उद्यमियों के लिए हालात कठोर हैं बजट पेश करने वाली अगली सरकार को बताना होगा कि वो वित्तीय घाटे को काबू में रखते हुए इन समस्याओं से कैसे निपटेगी।

सुपर पावर जैसी बातें करने वाले भारत में अब भी खेती मौसम और बारिश पर निर्भर है बीते कुछ सालों को देखें तो नहरें या खेती के लिए नई परियोजनाएं बहुत ही कम बनीं डीजल और बिजली महंगी होने से किसानों से लेकर आम लोगों तक की मुश्किलें जरूर बढ़ीं लगातार बढ़ रही महंगाई और राजकोषीय घाटा भारत में नई सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी। भारत की विकास दर को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने ये आशंका जताई है।

आईएमएफ के भारत में वरिष्ठ प्रतिनिधि थॉमस जे रिचर्डसन ने देश की नई सरकार के सामने संभावित आर्थिक चुनौतियों के बारे में कहा कि यूं तो भारत की आर्थिक तरक्की को लेकर आईएमएफ को काफी उम्मीदें हैं, लेकिन ऊंची महंगाई दर और राजकोषीय घाटा गंभीर चुनौती बन कर खड़े हैं, उन्होंने कहा कि महंगाई की वजह से सारे समीकरण गड़बड़ा रहे हैं यही वजह है कि राजकोषीय घाटा कम होने का नाम नहीं ले रहा है।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार किसी भी दल के नेतृत्व में बने, लेकिन उसके सामने आर्थिक विकास को रफ्तार देना सबसे बड़ी चुनौती होगी। ऐसे में देश में मजबूत आर्थिक सुधार के लिए कई ऐसे कदम उठाने होंगे जो सरकार के लिए आसान नहीं होंगे।

मार्च 2014 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 4.6 फीसदी थी कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने सरकारी खर्च में 13 अरब डॉलर की कटौती की और 16 अरब डॉलर की रियायत दी, लेकिन भविष्य में ऐसी कटौती को जारी रखना मुश्किल होगा, भारत में सरकारी कंपनियां तेल, गैस, खाद और अनाज बाजार दर से कम दाम में बेचती हैं इस नुकसान की भरपाई सरकारी खजाने से होती है नई सरकार को इसके लिए एक ठोस नीति तैयार करनी होगी ताकि सरकारी खजाना बचा रहे और जनता को उसकी जरूरतों से जुड़ी सभी चीजें कम दाम में मुहैया कराई जा सकें।

दूसरी तरफ टैक्स से होने वाली आय बढ़ने की उम्मीद कम है 2007-08 में जीडीपी का 12.5 फीसदी हिस्सा टैक्स से आया, लेकिन बीते साल ये गिर कर 10.2 फीसदी रह गया, नई सरकार के सामने चुनौती होगी कि वो इस हिस्सेदारी को बढ़ाए, नई सरकार के लिए चालू खाते में हो रहे घाटे को भी काबू में रखने की चुनौती होगी, बीते साल चालू खाते में रिकॉर्ड 4.8 फीसदी घाटा दर्ज किया गया इसकी वजह से सोने के आयात पर पाबंदी लगानी पड़ी अगर नई सरकार सोने पर लगने वाले आयात शुल्क की समीक्षा करती है, तो हो सकता है कि आम लोगों को इससे राहत मिले लेकिन निवेशकों के लिहाज से ये चिंताजनक हो सकता है, ऐसा करने से चालू खाते का घाटा और बढ़ सकता है।

नई सरकार के सामने अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ाने में सबसे बड़ी चुनौती परियोजनाओं की मंजूरी में लगने वाले समय को कमकरना होगा। साथ ही परियोजनाओं के दौरान आने वाली अड़चनों को दूर करके ही विकास की रफ्तार को बढ़ाया जा सकेगा 2014-15 के लिए पहली बार किसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ने 5.5 फीसद आर्थिक विकास दर का अनुमान लगाया है। एडीबीका कहना है कि भले ही अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत दिख रहे हों, लेकिन इसे रफ्तार पकड़ने में अभी वक्त लगेगा। एशियाई विकास बैंक के मुताबिक जब तक अर्थव्यवस्था के रास्ते में आने वाली अड़चनों को दूर नहीं कर लिया जाता, विकास दर में तेजीलाना मुमकिन नहीं होगा। हालांकि 2015-16 में एडीबी ने छह फीसदी विकास दर का अनुमान लगाया है।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई का मानना है कि 2014-15 में आर्थिक विकास की दर पांच से छह फीसदी के बीचरहने का अनुमान है। हालांकि साढ़े पांच फीसदी के इस अनुमान में भी कमी आने की आशंका बरकरार है। मतलब साफ है कि चाहे जो भी सरकार बने उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती विकास दर को बढ़ाने की होगी, लेकिन विकास दर को बढ़ाने के लिए जो भी रास्ता अपनाया जाए वो आर्थिक बाधाओं और कमजोर प्लानिंग की वजह से काफी मुश्किल भरा होगा।

चुनौती नंबर-1

जीएसटी को लागू करना

गुड्य एंड सर्विस टेक्स यानी जीएसटी को आर्थिक विकास के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। इससे आर्थिक विकास दर यानी जीडीपी में दो फीसदी की तेजी आ सकती है। इससे राज्य और केन्द्र सरकारों के टैक्स में समानता भी आएगी।

चुनौती नंबर-2

रिजर्व बैंक नियमों में बदलाव

रिजर्व बैंक की एक समिति ने मौद्रिक नीति में खुदरा महंगाई को आधार बनाने की सलाह दी है, साथ ही मौद्रिक नीति के लिए समिति बनाने का सुझाव दिया है जिससे गवर्नर अकेले फैसला नहीं ले सकेंगे। इसके लिए रिजर्व बैंक अधिनियम में सुधार करना होगा।

चुनौती नंबर-3

निजीकरण पर जोर

सरकार को राजस्व जुटाने और बढ़ते राजकोषीय घाटे पर काबू पाने के लिए सार्वजनिक कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचने की योजना तेज करनी होगी। घरेलू स्टॉक मार्केट में तेजी के इस दौर में ये ज्यादा फायदेमंद साबित होगा।

चुनौती नंबर-4

सब्सिडी का बोझ

देश की जीडीपी का 2.2 फीसदी के बराबर केवल सब्सिडी पर खर्च होता है, 2013-14 में अनाज, खाद और तेल पर सब्सिडी करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। नई सरकार को इसे कम करने के उपाय करने होंगे।

चुनौती नंबर-5

श्रम सुधार

कंपनियां लचीला श्रम कानून चाहती हैं। इससे अनुबंध पर दी जाने वाली नौकरियां बढ़ेंगी लेकिन इसके लिए कर्मचारी,कंपनी और मजदूर संगठनों को तैयार करना आसान नहीं होगा।

चुनौती नंबर-6

रक्षा क्षेत्र में निवेश

भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयात करने वाला देश है और इस क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा 26 फीसदी है। आयात का बोझ घटाने, हथियारों को आधुनिक बनाने और जवानों को बेहतर प्रशिक्षण देने के लिए इसमें विदेशी निवेश की सीमा बढ़ानी होगी।

चुनौती नंबर-7

बीमा क्षेत्र में सुधार

बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश 26 फीसदी से बढ़ा कर 49 फीसदी करने के प्रस्ताव को अमल में लाना आसान काम नहीं है। लेकिन 45 अरब डॉलर के बीमा क्षेत्र के लिए इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसे लेकर सरकार को विरोध का सामना करना पड़ सकता है।

चुनौती नंबर-8

मुश्किल में सरकारी बैंक

आर्थिक रफ्तार सुस्त पड़ने, उंची ब्याज दर और परियोजनाओं में देरी की वजह से सरकारी बैंकों का एनपीए बढ़ता जा रहा है आपको बता दें कि एनपीए वसूल न हो पाने वाले कर्ज को कहा जाता है। अंतरिम बजट में सरकार ने बैंकों को 11,200 करोड़ रुपये दिए लेकिन इस मामले में और ज्यादा मदद की जरूरत है।

चुनौती नंबर-9

कोयला क्षेत्र पर ध्यान

कोयला क्षेत्र में सुधार से देश का व्यापार घाटा कम होगा और बिजली परियोजनाओं में भी तेजी आएगी। कोयला क्षेत्र में भ्रष्टाचार सबसे बड़ी समस्या है। देश में कोयले का पर्याप्त भंडार होने के बावजूद बड़ी मात्रा में कोयला आयात करना पड़ता है।

चुनौती नंबर-10

बिजली की दुर्दशा

देश में अभी भी कई गांव ऐसे हैं, जिनमें अभी तक बिजली नहीं पहुंुच पाई है वहीं ज्यादातर गांवों में 8 से 10 घंटे की पावर सप्लाई है जिससे खेती और घरेलू उद्योग बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। बहुत से शहरों का भी यही हाल है सरकार के लिए शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त बिजली सप्लाई कर पाना भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं।

नई सरकार के लिए सत्ता का सिंघासन कांटो भरे ताज से कम नहीं। घोषणाओं को पूरा करने से लेकर लक्ष्यों को हासिल करने तक पहाड़ जैसी चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। वादों को निभाने के लिए पैसे की व्यवस्था और देश को विकास की राह पर दौड़ाने के लिए नए रास्ते तलाशने होंगे। जो भी पार्टी सत्ता में आएगी उसे किसानों, मजदूरों औरगरीब तबके के लोगों के लिए भी गंभीर कदम उठाने होंगे इसके अलावा नक्सलवाद और आंतकवाद को मुंह तोड़ जवाब देने के लिए सख्त कदम उठाने होंगे मरी हुई स्वास्थ्य सेवा में जान फूंकनी होगी और शिक्षा के क्षेत्र में भी नए आयाम कायम करने होंगे।

1991 के बाद से भारत की तमाम सरकारों ने सुधार की प्रक्रिया जारी रखी, किंतु धीमी रफ्तार से। और इस धीमी रफ्तार के बावजूद भारत विश्व की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था बन गया। पूरी दुनिया भारत की तरक्की से परेशान होने लगी क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय मंदी के दौर से भी हमारा देश काफी हद तक बच निकलने में कामयाब रहा मंदी के उस मुश्किल दौर में भी देश की अर्थव्यवस्था नौ प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी जब दुनिया भर में बेरोजगारी से हाहाकार मच रहा था तब भारत में, रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे थे और लाखों लोग गरीबी के चंगुल से बाहर निकल रहे थे। लेकिन कुछ साल पहले यूपीए सरकार की कुछ नीतियों ने अर्थव्यवस्था पर ऐसा प्रहार किया कि विकास की रफ्तर पर ब्रेक लगता चला गया आज देश की अर्थव्यवस्था किस दौर से गुज़र रही है शायद बताने की जरूरत नहीं।

क्यों बिगड़ी अर्थव्यवस्था?

कैसे रुकी विकास की रफ्तार?

यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में लगातार आर्थिक मुश्किलें बढ़ती गईं इसके पीछे ठोस कारण हैं दरअसल 2008-09 के दौरान 15वीं लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर यूपीए ने सब्सिडी पर जमकर खर्च किया। मनरेगा जैसी योजनाओं पर भी खर्च में भारी बढ़ोतरी की गई। राजकोषीय और राजस्व घाटे का स्तर बढ़ा, महंगाई और प्रमुख ब्याज दरें ऊंची बनी रहीं। दूरसंचार, खनन, भूमि अधिग्रहण आदि क्षेत्रों में अनिर्णय और भ्रष्टाचार ने अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया। नई बिजली उत्पादन परियोजनाओं में निवेश का मामला चिंताजनक हो गया। ईंधन कीमतें निर्धारित करने वाली नीति में कमियां नजर आईं, जिससे हजारों मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता ठप हो गई। 2जी आवंटन घोटाला, लौह अयस्क और कोयला खान वितरण घोटाला आगे भी अर्थव्यवस्था में तेजी लाने की राह में कई तरीकों से रोड़ों की भूमिका निभाते रहेंगे।

यूपीए-2 के दौरान विदेश व्यापार की रफ्तार थमी, चालू खाता घाटे में खतरनाक ढंग से इजाफा हुआ और मुद्रा का जबर्दस्त अवमूल्यन देखने को मिला। युवा आबादी के लिए रोजगार के अवसर कम होने लगे। बैंकिंग क्षेत्र में फंसे हुए कर्ज की मात्रा बढ़ जाने से सरकारी बैंकों की वित्तीय स्थिरता पर बुरा असर पड़ा। कृषि क्षेत्र और छोटे किसानों पर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा सका। भारत में खेती पर निर्भर आबादी दुनिया में सबसे अधिक तेज गति से बढ़ी, लेकिन इस क्षेत्र में लोगों की आय बढ़ने के बजाय घट गई।

कैसे हो सुधार ?

देश में आर्थिक सुधारों से भी कहीं ज्यादा जरूरी प्रशासनिक, न्यायिक और पुलिस सुधार हैं। फौरन फैसले लेने, उन्हें पूरा करने, कानून का शासन लागू करने, भ्रष्टाचारियों को सज़ा दिलाने और सरकार को लोगों के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए एक मजबूत सरकार की जरूरत है। देश की उन्नति युवा शक्ति पर टिकी है, फिलहाल देश में युवाओं की संख्या कुल आबादी की एक-तिहाई है अनुमान है कि आने वाले दशक में ये बढ़कर आधे हो जाएंगे। युवा वर्ग भी इस बात से हैरान-परेशान हैं कि जो देश उन्हें धार्मिक और राजनीतिक स्वतंत्रता देता है आखिर वो उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता दे पाने में नाकाम साबित क्यों हो रहा है।


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