मुक्ति भवन, इस मसान (फिल्म नहीं) वाले किस्से के ठीक पहले का दृश्य दिखाती है. बनारस में मुक्ति भवन या मोक्ष भवन जैसे ठिए उनके लिए बनाए गए हैं जो गंगा किनारे देह छोड़कर मोक्ष पाने की इच्छा रखते हैं. इस फिल्म के जरिए (बतौर एक हिंदुस्तानी) अपने बारे यह जानना बहुत रोचक है कि मरने के बाद भी हम स्वर्ग नहीं मुक्ति चाहते हैं!

यह फिल्म माया से मुक्ति के बाद घेरने वाली मुक्ति की माया की झलक दिखाती है. यह बताती है कि कैसे कुछ लोग सालों-साल इस तरह की धर्मशालाओं में मौत का इंतजार करते बिता देते हैं, और कैसे कुछ आते हैं और चटपट अपने हिस्से का मोक्ष बुक कर ऊपर की यात्रा पर निकल जाते हैं.

फिल्म 76 साल के दयानंद कुमार यानी ललित बहल और उनके बेटे राजीव यानी आदिल हुसैन की कहानी कहती है. राजीव एक प्राइवेट नौकरी करने वाला आम इंसान है. वह एक परंपरागत बेटा और परंपरागत बाप है जो पिता का कहा टाल नहीं पाता और बेटी का कहा सुनना भी नहीं चाहता. पिता की इच्छा और उससे ज्यादा जिद के चलते वह उन्हें उनके अंतिम समय में मुक्ति भवन लेकर जाता है. यहां पहुंचकर पिता मृत्यु का इंतजार करते हुए जिंदगी की नई लीक पकड़ते हैं और बेटे को भी उसका सिरा पकड़ा देते हैं. आगे के दृश्यों में बेटा अगली पीढ़ी तक इसे पहुंचाता है और इस तरह फिल्म मृत्यु के बहाने जीवन की बात करती है.

कांधे पर जिम्मेदारियां उठाए, अधेड़ उम्र के बेटे की भूमिका करते हुए आदिल हुसैन ने फिल्म से खुद को एकदम गायब कर दिया है. इस भूमिका के लिए वे कुछ अलग तरीके से संवाद बोलते भी नजर आए हैं. पिछली बार तितली में नजर आए ललित बहल अपने से दस-पंद्रह साल ज्यादा उम्र के बुजुर्ग की भूमिका बड़ी ईमानदारी से निभाते हैं. बाप-बेटे के कुछ भावुक कर देने वाले दृश्यों में दोनों ने कमाल का अभिनय किया है. पिता द्वारा बेटे के कविताओं के शौक के बारे में पूछना या बेटे के पिता के अगले जन्म में कंगारू बनने की ख्वाहिश पर अचंभित होने वाले दृश्य बेमिसाल हैं.

करीब पौने दो घंटे की लंबाई वाली इस फिल्म में इंटरवल के बाद एकाध दृश्य ऐसे आते हैं जब कुछ मिनट आपको फिल्म जबरन खिंचती हुई लगती है. बाकी स्क्रिप्ट खूब सधी हुई है और लिखने वाले ने पांव जमीन पर टिकाकर इसे लिखा है. फिल्मांकन एकदम सादा है और कहानी के लिहाज से बेहतरीन. फिल्म में संवादों का सहारा कम ही लिया गया है. ज्यादातर विजुअल से बात कही गई है, जैसे पिता से जिंदगी को नई तरह से देखने की नजर लेकर लौटा बेटा अपनी खुद की बेटी को सिर्फ स्कूटर स्टार्ट करके देता दिखता है. यह दृश्य जिस तरह से फिल्माया गया है, बिना एक भी शब्द खर्च किए बहुत कुछ कह जाता है. फिल्म मृत्यु का दर्शन बताने के बजाय उसकी सहजता की बात करती है. इसमें अंतिम यात्रा, घाट और चिताओं के दृश्यों के बीच बाकी रह गई इच्छाएं, भ्रम, दुख या जिज्ञासा जैसे भाव मिला-जुलाकर सामने रखे गए हैं.

निर्देशक शुभाशीष भूटियानी के बेहतर निर्देशन ने कलाकारों से उनका सबसे अच्छा काम निकलवाया है. ललित बहल और आदिल हुसैन के अलावा नवनींद्र बहल, पलोमी घोष और गीतांजलि कुलकर्णी मुख्य भूमिकाओं में हैं. ये सब ठीक वैसा शानदार अभिनय करते हैं जिसके लिए जाने जाते हैं. कुल मिलाकर ये सब वजहें मुक्ति भवन को एक जरूर देखे जाने वाली फिल्म बनाती हैं.